ख़त

कहने को होते थे हज़ारों लब्ज़ जो ज़ुबान से बयान नहि होते थे,
मुल्कों की सीमा तोड़के,काग़ज़ पर सँवार होते थे।
चाहे बदले ज़माना स्याही की बूँद से टाइपिंग की  दीवार तक,
ख़ैर वह प्रतीक्षा की धड़कन खो छूके हे हम!

वक़्त बेवक्त लिखते थे बेमिसाल शब्द,
कभी यादों की ख़त्म होनेवाली दास्ताँ,
दोस्त-मिल गए बहोत नए उपकरण इस ज़माने में,
मोबाइल की गूँज से,डाकिया के सायकल की घंटी भूल गए।

सोचता हूँ कैसे होते थे लिखने वाले आशिक़,
और हवा से ख़त पहुँचाने वाले कबूतर?
ख़ुशी होती थी तो सम्भाल के रखते थे,
ग़म के काग़ज़ फाड़ के फेंकते थे।

शाला में खेलते थेमाँ,मेरा ख़त...’
शायद वह ख़त हमेशा के लिए खो बैठे हम,
अब बस रेडियो सेसंदेसे आते हेसुनेंगे,
या देखेंगेलिखे जो ख़त तूजे
अबवह सवेराहोगा या नहि,पता नहि,
गाव-शहरोंकेपिन-कोडअब फिरसे होंठोंन्पे मिलेंगे नहि

©️सुज़ित



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