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हरवलेले शब्द

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बोलण्यासाठी   हवेत   शब्द , टाळण्यासाठी   रुक्ष   शांतता , हरवते   कोसोदूर   चित्ती , मनातल्या   भावनांची   गर्तता …! दाटते   रेशमी   दाट   धुके , ओठांत   रुते   शब्द   मुके , अबोल   हृदयात   वाजे , टिकटिकीचे   असंख्य   ठोके …! आस   लागे   मनांत , मन   हरवते   आसमंत , न   लागे   कशास   थांग , लांब   लांब   अंतर   अनंत …! कल्लोळ   म्हणावा   की   अन्य , बेरीज - वजाबाकी   शून्य , कशात   होई   धन्य , कोडं   हे   सुटेना ..! बोलावे   कि   राहावे   अबोल , शिरावे   का   इतके   सखोल ? कि   चालत   राहावे   भूगोल ? भेटे   पृथ्वी   बोलता   बोलता   गोल ..! देह   मनाचे   आगार , मन   विचारांचे   भांडार , मेळ   घालूनी   सत्वर , फिरवावा   मैत्रीचा   नांगर ..! याची   मनांतले   श्लोक   पुरे , कितीही   बोलत...